दो मेहनती भाईयों की कहानी,​ जिन्होंने पत्थर तोड़-तोड़कर अपने छोटे भाई को बनाया टीचर

दो मेहनती भाईयों की कहानी,​ जिन्होंने पत्थर तोड़-तोड़कर अपने छोटे भाई को बनाया टीचर

किस्से तो बहुत सुने होंगे लेकिन आज एक हकीकत का किस्सा सुनाने जा रहे है। मेहनती दो भाईयों की हकीकत की कहानी। जी हां ये कहानी ऐसी ही एक हिम्मती सपने की हैं जिसे पत्थर तोड़ते तोड़ते देखा गया था। यह कहानी एक ऐसी कबीले की कहानी हैं जिसने अब अपनी परिभाषा ही बदल दी।

कहते हैं कोशिश करने वालों की कभी हार नही होता। ये वाक्या बिल्कुल सटीक बैठ रहा है। एक ऐसी ही कोशिश की है, दो भाईयों ने। मामला राजस्थान के बाड़मेर का है, ये कहानी हैं कालबेलिया समाज के एक युवक मीठाराम की। मीठाराम ने कोशिश ही नहीं, बल्कि उस कोशिश को अपने बड़े भइयों के आशीर्वाद से साकार भी किया हैं। मीठाराम के सिर से मां बाप का साया बचपन में उठ गया था।

पहले पिता की मौत फिर ठीक 9 वर्ष बाद मां का भी चल बसीं। उसके सिर से मां और बाप का दोनों का साया उठ गया। इसके बाद पूरे परिवार को पालने की जिम्मेदारी बड़े भाइयों, खामिश्नाथ और किशननाथ के ऊपर आ गयी, 5 भाइयो में यही दोनों कमाने वाले थे और कमाने का जरिया था मजदूरी व पत्थर तोड़ना। आपने दशरथ मांझी का नाम सुना होगा, जी हां वहीं जिसपे एक मूवी भी बन चुकी है जिसमें नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने दशरथ मांझी का किरदार निभाया था। दशरथ मांझी ने पत्थर तोड़ तोड़ कर रास्ता बना दिया था।

दोनों कहानियां लगभग एक जैसी ही हैं यहां भी बड़े भाई खामिश्नाथ और किशननाथ ने भी पत्थर तोड़ते तोड़ते अपने भाई को टीचर बनाने का रास्ता बना दिया था।मीठाराम राम का पूरा परिवार रोजगार के अभाव की वजह से अपना पुश्तैनी गांव छोड़ कर दूसरे गांव भियाड़ आ गए। यहां के एक जमींदार जीवराज सिंह भियाड़ ने उन्हें अपने यहाँ काश्तकार रख लिया और उन्हें हर जरूरी मदत मुहैया करवाई। दोनों बड़े भाई जी जान से मजदूरी आदि का काम करते और मीठाराम पढ़ाई में अपना मन लगाया रहता था।

एक लंबे वक्त के बाद इनमें से एक भाई का चयन सब इंस्पेक्टर के पद पर हो गया और छोटा भाई प्राइमरी में सरकारी अध्यापक नियुक्त हुआ। दोनों भाइयों की मेहनत रंग लाई। इन दोनों युवकों ने आने काबेलिया समाज के लिए भी एक मिसाल प्रस्तुत किया। यह दोनों न सिर्फ अपने समाज बल्कि हर उस नौजवान के लिए प्रेन्नास्त्रोत है जिसने खुद की फोटो हर हाल में बदलने की ठानी हैं।

एक ऐसे समाज से निकलकर जहां लोग कभी शिक्षित नही थे से सरकारी पदों पर आसीन होना, जो कभी शिक्षा के अभाव में रहा अब वो शिक्षा का अलख जगा रहा हैं। अपने आप मे एक बेहतरीन मिसाल हैं। कहते हैं लगातार कोशिश के साथ अपनों का साथ भी जरूरी हैं, अगर ये दोनों मिल गई तो समझ लेना आपको कोई नहीं रोक सकता तरक्की पाने में।

Vishi

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